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Devbhumi Discover > उत्तराखण्ड > दून अनुपमा हत्याकांड फिर सुर्खियों में, दोषी राजेश गुलाटी ने कोर्ट में पेश किए नए सबूत
उत्तराखण्डक्राइम

दून अनुपमा हत्याकांड फिर सुर्खियों में, दोषी राजेश गुलाटी ने कोर्ट में पेश किए नए सबूत

Devbhumi Discover
Last updated: October 8, 2025 9:54 am
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9 Min Read
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देहरादून:

देश को झकझोर कर रख देने वाला वर्ष 2010 का अनुपमा गुलाटी हत्याकांड फिर चर्चा में है। जिसमें अनुपमा के पति राजेश गुलाटी ने पत्नी की हत्या कर उसके शव के 72 टुकड़े कर दिए थे। दरअसल, हाई कोर्ट ने देशभर में चर्चित देहरादून के अनुपमा गुलाटी हत्याकांड के मामले में आजीवन की सजा काट रहे अनुपमा के पति राजेश गुलाटी की अपील पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान राजेश के अधिवक्ता ने अतिरिक्त सबूत पेश करने के लिए कोर्ट से समय मांगा है। कोर्ट ने अतिरिक्त समय देते हुए अगली सुनवाई को 28 अक्टूबर की तिथि नियत की है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी व न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ में सुनवाई के दौरान गुलाटी की तरफ से कहा गया कि उनके पास कुछ और सबूत भी हैं।

अनुपमा गुलाटी हत्याकांड: देहरादून की वह भयावह रात जब पत्नी के शव को 72 टुकड़ों में बांट दिया गया
एक दशक से भी अधिक पुराना यह मामला आज भी लोगों के रोंगटे खड़े कर देता है। देहरादून की शांत वादियों में वर्ष 2010 में घटित यह हत्या न केवल क्रूरता की चरम सीमा थी, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक, मनोवैज्ञानिक विकृति और पारिवारिक तनाव का भयानक संगम भी दिखा। आईटी पेशेवर राजेश गुलाटी ने अपनी पत्नी अनुपमा गुलाटी की हत्या कर शव को लगभग 72 टुकड़ों में काट दिया था और लंबे समय तक उन्हें एक डीप फ्रीजर में छिपाकर रखा। बाद में वह उन टुकड़ों को धीरे-धीरे शहर से बाहर फेंकता गया। यह वह मामला था जिसने 2010 में उत्तराखंड पुलिस और समाज दोनों को झकझोर दिया। अदालत ने इसे “योजनाबद्ध और अत्यंत नृशंस हत्या” करार दिया और आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

पति-पत्नी के बीच तनाव से शुरू हुई भयावह कहानी
अनुपमा और राजेश गुलाटी की शादी वर्ष 1999 में हुई थी। जिसके बाद दोनों 06 वर्ष के लिए अमेरिका चले गए थे और फिर देहरादून लौट आए थे। वह यहां प्रकाश नगर में 02 कमरों के किराए के घर में रहते थे। उनके दो छोटे बच्चे थे, चार वर्ष के जुड़वा बेटा और बेटी। बाहरी तौर पर यह एक पढ़े-लिखे, संपन्न परिवार की तस्वीर थी, लेकिन अंदर ही अंदर यह रिश्ता टूट चुका था।

अनुपमा को संदेह था कि राजेश का किसी अन्य महिला से संबंध है। झगड़े आम बात बन चुके थे। रिश्तों की गर्माहट अब कड़वाहट में बदल गई थी। आसपास के लोग बताते हैं कि दोनों के बीच आए दिन बहस होती थी, लेकिन किसी ने सोचा नहीं था कि यह कलह ऐसी विभीषिका में बदलेगी।

हत्या की रात, जब क्रूरता ने इंसानियत को चीर दिया
17 अक्टूबर 2010 की रात, राजेश और अनुपमा के बीच जोरदार झगड़ा हुआ। गुस्से में राजेश ने अनुपमा को मारा, जिससे उसका सिर दीवार से टकराया। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। राजेश ने डर के मारे उसके नाक-मुहं में कपास ठूंस दिया और तकिये से दबाकर उसका दम घोंट दिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, मौत का कारण अस्फिक्सिया (घुटन) था, यानी सांस बंद होने से मौत।

हत्या के बाद राजेश ने ऐसा अपराध किया जिसकी कल्पना भी भयावह है। उसने इलेक्ट्रिक आरी (electric saw) खरीदी और पत्नी के शव को लगभग 72 टुकड़ों में काट डाला। इन टुकड़ों को उसने प्लास्टिक बैग्स में भरा और घर में रखे एक डीप फ्रीजर में जमा कर दिया। कई दिनों तक वह शव के टुकड़ों को छिपाकर रखता रहा। धीरे-धीरे उसने उन्हें अलग-अलग दिनों में बाहर फेंकना शुरू किया ताकि पुलिस या पड़ोसी शक न करें।

डिजिटल धोखे और अपराध छिपाने की कोशिश
हत्या के बाद राजेश ने परिजनों को भ्रमित करने के लिए डिजिटल तकनीक का सहारा लिया। उसने अनुपमा के ईमेल और सोशल मीडिया अकाउंट्स से खुद संदेश भेजे, ताकि परिवार और दोस्तों को लगे कि वह जिंदा है और किसी रिश्तेदार के पास गई है। यह “डिजिटल मैनिपुलेशन” पुलिस जांच में एक अहम सुराग बना। पुलिस ने बाद में अनुपमा के भाई सुजान कुमार प्रधान की शिकायत पर राजेश के घर तलाशी ली। कमरे में बंद फ्रीजर खोलने पर जब टुकड़ों से भरे थैले मिले तो पूरा देहरादून सन्न रह गया।

फॉरेंसिक रिपोर्ट जिसने खोली सच्चाई
फॉरेंसिक टीम ने मौके से मिले टुकड़ों का DNA परीक्षण कराया, जिसने पुष्टि की कि शव अनुपमा का ही था। घर के विभिन्न हिस्सों में रक्त के धब्बे, उपकरणों पर निशान, और फ्रीजर में जैविक अवशेष मिले। फॉरेंसिक रिपोर्ट ने यह भी दर्शाया कि हत्या के बाद शव को कई सप्ताह तक ठंडे तापमान में रखा गया था।यह मामला डिजिटल और फिजिकल फॉरेंसिक के संयोजन से सुलझाया गया। भारत के अपराध जांच इतिहास में इसे एक ‘मॉडल केस’ के रूप में गिना जाता है।

अदालत का फैसला: “पूर्व नियोजित हत्या”
07 साल चले मुकदमे के बाद देहरादून की सत्र अदालत ने 31 अगस्त 2017 को राजेश गुलाटी को हत्या (IPC धारा 302) और साक्ष्य नष्ट करने (IPC धारा 201) का दोषी पाया। 1 सितंबर 2017 को न्यायालय ने उसे आजीवन कारावास की सजा और 15 लाख रुपये जुर्माना सुनाया।

अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि आरोपी का कृत्य केवल आवेश में नहीं, बल्कि पूर्ण योजना और अत्यंत निर्दयता से किया गया है। यह ऐसा अपराध है जो समाज को झकझोर देता है।” अनुपमा के जुड़वां बच्चे उस समय मात्र चार वर्ष के थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, परिवार ने बच्चों को इस सच्चाई से दूर रखा कि उनके पिता ने ही उनकी मां की हत्या की थी। आज भी बच्चे पिता का नाम सुनकर सिहर उठते हैं।

इस त्रासदी ने न केवल एक परिवार, बल्कि पूरे समाज में यह सवाल खड़ा किया कि शिक्षा, आधुनिकता और सभ्यता के बावजूद, मनुष्य का क्रूर पक्ष कब उभर आता है। फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिकों ने इस केस को “नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर” और “कंट्रोल ऑब्सेशन” का उदाहरण बताया। ऐसे अपराधों में आरोपी को अपने साथी के जीवन और अस्तित्व पर पूर्ण अधिकार का भ्रम हो जाता है। घरेलू हिंसा विशेषज्ञों ने इसे “दबी हुई आक्रोश और पितृसत्तात्मक मानसिकता” का चरम बताया।

Shraddha Walkar केस से तुलना
वर्ष 2022 में जब दिल्ली में श्रद्धा वाकर हत्याकांड सामने आया, तो मीडिया ने इसे अनुपमा केस से तुलना करते हुए “डीप फ्रीजर की पुनरावृत्ति” कहा। दोनों मामलों में समानता थी प्रेम या विवाहिक संबंध में तनाव और हत्या के बाद शव को टुकड़ों में बांटना, फ्रीजर / रेफ्रिजरेटर में रखना और डिजिटल तरीकों से झूठी उपस्थिति बनाना। यह तुलना बताती है कि समाज में संबंधों की हिंसक परिणति कितनी भयावह हो सकती है।

एक शहर, एक सदी, एक सबक
देहरादून का अनुपमा गुलाटी हत्याकांड केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं था। यह उस युग की कहानी है, जब तकनीक, शिक्षा और सामाजिक हैसियत भी इंसानी मूल्यों को नहीं बचा पाई। यह केस एक सबक है कि “घरेलू कलह, संदेह और अहंकार जब विवेक पर हावी हो जाते हैं, तो शिक्षित व्यक्ति भी दरिंदगी की हदें पार कर सकता है।” राजेश गुलाटी आज भी जेल में है। अनुपमा अब नहीं रही, लेकिन उसकी कहानी भारत की अपराध मनोविज्ञान की किताबों में हमेशा जीवित रहेगी।

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